Wednesday, July 17, 2024

अन्नप्राशन संस्कार क्यों किया जाता है, जानें महत्व और इसकी सही विधि…..

अन्नप्राशन संस्कार का हिदू धर्म में बड़ा महत्व है. अन्नप्राशन संस्कार 16 संस्कार के सातवें स्थान पर आता है. जन्म के छह माह तक शिशु माता के दूध पर ही निर्भर रहता है. इसके बाद जब पहली बार शिशु को पारंपरिक विधियों के साथ अनाज खिलाया जाता तो उसे अन्नप्राशन संस्कार है कहते हैं.

बच्चे के शारीरिक विकास के लिए अन्नप्राशन संस्कार किया जाता है. आइए जानते हैं अन्नप्राशन संस्कार का महत्व, विधि और लाभ.

अन्नप्राशन संस्कार कब करें ? (Annaprashan Sanskar Time)

बच्चा जब छठवें या सातवें महीने का हो जाए तब उसका अन्नप्राशन संस्कार करना ठीक रहता है,क्योंकि इस समय तक उसके दांत निकल चुके होते हैं. ऐसे में वह हल्का अनाज को पचाने में सक्षम होता है.

अन्नप्राशन संस्कार का महत्व (Annaprashan Sanskar Significance)

भगवद गीता के अनुसार अन्न से केवल शरीर का पोषण ही नहीं होता,अपितु मन,बुद्धि ,तेज और आत्मा का भी पोषण होता है. अन्न को प्राणियों का प्राण कहा गया है. शास्त्रों के अनुसार शुद्ध आहार से ही तन और मन दोनों शुद्ध होते हैं शरीर में सत्वगुण की वृध्दि होती है. अन्नप्राशन के जरिए बच्चे के शुद्ध,सात्विक और पौष्टिक अन्न ग्रहण करने की शुरुआथ की जाती है, जिससे उसके विचारों, भावनाओं में सकारात्मकता पैदा हो.

अन्नप्राशन संस्कार की विधि (Annaprashan Sanskar Vidhi)

अन्नप्राशन संस्कार के दिन शुभ मुहूर्त में बच्चे के माता पिता अपने ईष्ट देवी-देवताओं की पूजा करते हैं. उन्हें चावल की खीर का भोग लगाया जाता है और फिर चांदी के कटोरी-चम्मच से यही खीर बच्चे को चटाई जाती है. चावल की खीर देवों का अन्न मानी जाती है इसलिए अन्नप्राशन संस्कार में बच्चे को खिलाते समय ये मंत्र बोलना चाहिए. – शिवौ ते स्तां व्रीहियवावबलासावदोमधौ । एतौ यक्ष्मं वि वाधेते एतौ मुञ्चतो अंहसः॥ है।

अर्थात – हे ‘बालक! जौ और चावल तुम्हारे लिये बलदायक तथा पुष्टिकारक हों। क्योंकि ये दोनों वस्तुएं यक्ष्मा-नाशक हैं तथा देवान्न होने से पापनाशक हैं।’

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